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	<title>Comments on: BUDHAN BOLTA HAI&#8230;A Street Play @ CROSSWORD, MITHAKHALI, AHMEDABAD</title>
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	<link>http://budhantheatre.org/2008/12/27/budhan-bolta-haia-street-play-crossword-mithakhali-ahmedabad/</link>
	<description>The Official Budhan Theatre Website</description>
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		<title>By: dakxin</title>
		<link>http://budhantheatre.org/2008/12/27/budhan-bolta-haia-street-play-crossword-mithakhali-ahmedabad/comment-page-1/#comment-1236</link>
		<dc:creator>dakxin</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 03 Jun 2010 14:10:18 +0000</pubDate>
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		<description>Dear Vaishakh, Very good poem...carry on...i would be happy to use it in our one of plays.
Thanks.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>Dear Vaishakh, Very good poem&#8230;carry on&#8230;i would be happy to use it in our one of plays.<br />
Thanks.</p>
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		<title>By: vaishakh</title>
		<link>http://budhantheatre.org/2008/12/27/budhan-bolta-haia-street-play-crossword-mithakhali-ahmedabad/comment-page-1/#comment-1201</link>
		<dc:creator>vaishakh</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 26 May 2010 05:07:17 +0000</pubDate>
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		<description>बुधन 
मिटटी की कोख से निकलता है,
और फिर  बुधन बोलता है.
मुझे सुनोगे तो दहल जाओगे &#124;
में ज़मीं जंगल में हु,
हर घर में हो रहे दंगल में हु,
सोलह बरस की बलात्कारी बच्ची में हु,
में उसके केस को लिखती सरकारी बग्गी में हु,
एक टांग से डोरी पे  चलते वोह छोटे बच्चे में हु,
उसके खेल को देखकर भीड़ ने फेके उस पेसो के टुकड़े में हु,
में हर गन्दी बस्ती के उस कोने में हु  
जहा एक नंगा बच्चा अपनी भूख मिटाने जो ठूंठ रहा है में उस चावल के दाने में हु,
जहा एक निर्दोष बेटे की लाश लटकी है में उस डाली में हु,
उसके बाप के मुह से निकली हर गन्दी गलीच गाली में हु,
में चाँद के हर छिछोरे पन में हु जो हमें कभी ठंडक नहीं देता 
में फिर भी मेरे बच्चो के शब्दों में हु जो चाँद को &quot;चंदा मामा&quot; कहेता 
में बदूक से निकली हर गोली की सोच में हु 
पानी के लिए तड़प रहे &quot;पिन्हारी काले की मौत&quot; में हु 
में नाच-गाने,नट-नटी हर कला में हु जो हमें रोटी कमाना सिखाती है 
और में उस माँ में भी हु जो अपना शरीर बेच कर अपनी छुटकी को पढाती है 
ग्राहक को खिचती वेश्या की हर अदा में हु 
रात को फुट फुट कर रोती हर बेवा में हु
में खिलोने की लारी में हु
मुझे चोर की नज़र से देखती हर बारी में हु 
में बच्चे की जिद में हु 
ज़ुल्म की तरफ उठती हर चीख में हु 
में हर किताब के हर पन्ने पर हु जहा आग लिखा है 
में हर अधूरे सपने में हु जिसकी आँख  पर आगाज़ लिखा है 
अख़बार पर तड़पती हर खबर में हु 
&quot;खुदा&quot; को देख कर &quot;भगवान्&quot; जो बदले में वोह कतराती हर नजर  में हु
में जंगल की तरह सारे संसार में हु
में लात में हु,घुसे में हु,पूलिस की हर मार में हु
में माँ के प्यार में हु
में बाप की दुत्कार में हु 
सरकार ने निकाली हर लोटरी में हु
में पूलिस की काली कोठरी में हु 
में राम के वनवास में हु
और में सीता की सच्चाई में हु 

मिटटी की कोख से निकलता है 
और फिर &quot;बुधन&quot; बोलता है
मेने कहा था ना मुझे सुनोगे तो दहल जाओगे &#124;
वैशाख राठोड</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बुधन<br />
मिटटी की कोख से निकलता है,<br />
और फिर  बुधन बोलता है.<br />
मुझे सुनोगे तो दहल जाओगे |<br />
में ज़मीं जंगल में हु,<br />
हर घर में हो रहे दंगल में हु,<br />
सोलह बरस की बलात्कारी बच्ची में हु,<br />
में उसके केस को लिखती सरकारी बग्गी में हु,<br />
एक टांग से डोरी पे  चलते वोह छोटे बच्चे में हु,<br />
उसके खेल को देखकर भीड़ ने फेके उस पेसो के टुकड़े में हु,<br />
में हर गन्दी बस्ती के उस कोने में हु<br />
जहा एक नंगा बच्चा अपनी भूख मिटाने जो ठूंठ रहा है में उस चावल के दाने में हु,<br />
जहा एक निर्दोष बेटे की लाश लटकी है में उस डाली में हु,<br />
उसके बाप के मुह से निकली हर गन्दी गलीच गाली में हु,<br />
में चाँद के हर छिछोरे पन में हु जो हमें कभी ठंडक नहीं देता<br />
में फिर भी मेरे बच्चो के शब्दों में हु जो चाँद को &#8220;चंदा मामा&#8221; कहेता<br />
में बदूक से निकली हर गोली की सोच में हु<br />
पानी के लिए तड़प रहे &#8220;पिन्हारी काले की मौत&#8221; में हु<br />
में नाच-गाने,नट-नटी हर कला में हु जो हमें रोटी कमाना सिखाती है<br />
और में उस माँ में भी हु जो अपना शरीर बेच कर अपनी छुटकी को पढाती है<br />
ग्राहक को खिचती वेश्या की हर अदा में हु<br />
रात को फुट फुट कर रोती हर बेवा में हु<br />
में खिलोने की लारी में हु<br />
मुझे चोर की नज़र से देखती हर बारी में हु<br />
में बच्चे की जिद में हु<br />
ज़ुल्म की तरफ उठती हर चीख में हु<br />
में हर किताब के हर पन्ने पर हु जहा आग लिखा है<br />
में हर अधूरे सपने में हु जिसकी आँख  पर आगाज़ लिखा है<br />
अख़बार पर तड़पती हर खबर में हु<br />
&#8220;खुदा&#8221; को देख कर &#8220;भगवान्&#8221; जो बदले में वोह कतराती हर नजर  में हु<br />
में जंगल की तरह सारे संसार में हु<br />
में लात में हु,घुसे में हु,पूलिस की हर मार में हु<br />
में माँ के प्यार में हु<br />
में बाप की दुत्कार में हु<br />
सरकार ने निकाली हर लोटरी में हु<br />
में पूलिस की काली कोठरी में हु<br />
में राम के वनवास में हु<br />
और में सीता की सच्चाई में हु </p>
<p>मिटटी की कोख से निकलता है<br />
और फिर &#8220;बुधन&#8221; बोलता है<br />
मेने कहा था ना मुझे सुनोगे तो दहल जाओगे |<br />
वैशाख राठोड</p>
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